जीवन चक्र की यात्रा का आत्म ज्ञान
धरा के प्रत्येक प्राणिमात्र के जीवन की सफलता उसके कर्मो पर निर्भर करती है। प्राणी द्वारा किये गए कर्म उसके ज्ञान, संकल्प, साहस तथा आचरण पर निर्भर करते हैं। अपने आपको जाने बिना व्यक्ति को अपनी क्षमता का आभास नहीं हो सकता। यह वही आत्म ज्ञान है जिसका विवेचन कर मनुष्य विश्वास के साथ अपने जीवन चक्र की यात्रा सफलता के साथ करता है। सभी प्राणियों में केवल मनुष्य में यह विशेषता होती है कि वह अपने विवेक का प्रयोग कर जीवन की एक धारा निर्धारित कर सकता है। धीरे धीरे सफलता की ऊंचाइयों तक पहुंच जाता है।
स्वयं की शक्तियों को पहचानने का ज्ञान ही तो जीवन-दर्शन का तत्व है, जिसको आत्म-तत्व भी कहते हैं। यही वह ज्ञान है जो हमें अपनी शक्तियों को समाज के कार्यो में लगाने की प्रेरणा देता है। ज्ञानेंद्रियां मन के अधीन होती हैं और मन बुद्धि के। बुद्धि का संबंध आत्मा से है जो बुद्धि को संयत रहने के लिए प्रेरित करती है। यह आत्मा ही परमात्मा का अंश है। आत्मा का विकास होने पर वह महान-आत्मा तथा महान से ऊपर उठने पर वह परमात्मा तक हो जाती है।
शास्त्रों के अनुसार श्री राम, श्री कृष्ण, बुद्ध, महावीर स्वामी आदि मानव शिशु के रूप में जन्म लेकर बालक की भांति खेलकर अपनी आत्मा को विकसित कर महात्मा और परमात्मा तक हो गए।
आत्मतत्व नित्य एवं शाश्वत है। आत्म-तत्व, पुष्प से भी बड़ी सुगंध की भांति अपनी महत्ता रखता है जो पुष्प को तो सुवासित करता ही है, इससे आसपास का वातावरण भी सुवासित होकर आनंदित हो जाता है। जीवन दर्शन का मूल तत्व कर्मो से विमुख होकर तपस्या करने का निर्देश नहीं देता, बल्कि कर्तव्य पालन को ही प्राथमिकता देता है। आत्मा सबके शरीर के अंदर विद्यमान है, सर्वशक्तिमान है, ईश्वर का अंश है। ईश्वर सर्वशक्तिमान है तो उसका अंश जीव शक्ति संपन्न क्यों न होगा। सत्य तो यह है कि ईश्वर किसी को निर्बल या सबल होने का वरदान नहीं देता। उसके लिए सभी समान हैं। ईश्वर ने सभी को अपना अंश 'आत्मा' दी है जो स्वत: शक्ति संपन्न है।
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