आज हम आपको कूछ पारम्परिक हिमाचली लोक वाद्य यंत्रो से अवगत करने जा रहे है
। हिमाचल प्रदेश में लोक संस्कृति का विशेष महत्व है ऐसे में अगर हिमाचल प्रदेश के वाद्ययंत्र की बात की जाये तो यह कहना गलत नहीं होगा, जब हिमाचली वाद्य-यंत्र अपने सुर-ताल में बजते है तो देवी देवता की देवभूमि हिमाचल प्रदेश केे साथ-साथ दूसरे राज्य के लोग भी झुम उठते हैं। पहाड़ी शादी-ब्याह, मेले- त्योहार या किसी मांगलिक अवसर पर जब लोग नाच रहे हो, या देव यात्रा हो रही हो और वहाँ पर हिमाचली वाद्ययंत्र का सुर ताल न छिड़े ऐसा हो ही नहीं सकता। हिमाचली वद्य यंत्र की बनावट व् बजाने की कला भले ही पूरे प्रदेश की भाषा और शैली के आधार पर पृथक-पृथक हो सकती है लेकिन इन वाद्य-यंत्रो से निकलने वाली धुनें दिल को छु लेती है। देवनृत्य हो या नाटी, बजन्तरी यानी वाद्य (बाजा) बजाने वाले तो चाहिये ही। अलग-अलग साज-बाज बजाने वालों को यहां पर साज के नाम से भी पुकारते हैं जैसे— ढोल बजाने वाला ‘ढोली’, करनाल बजाने वाला ‘करनालची’ और शहनाई बजाने वाला ‘सनाची ! हिमाचल के अलग-अलग भागों के वाद्य यंत्रों के नाम में विभिन्नता हो सकती हैं परन्तु ये कुछ साज-बाज ऐसे हैं जो पूरे प्रदेश में एक जैसे है।
नगाड़ा -: या नगारा वाद्यों में सबसे प्रमुख माना जाता है। ताम्बे के बड़े तसले के खाली भाग पर चमड़ा कसकर बनाए जाने वाले इस वाद्य को चमड़े की नाड़ से यूं कसा जाता है कि यह बड़ी कर्णप्रिय आवाज निकालता है। नगाड़े को दो लकडिय़ों से बजाया जाता है। सामान्यत: इसे कई जगह गले से लटकाकर बजाया जाता है। यात्रा के दौरान इसे एक व्यक्ति पीठ पर लादता है तो दूसरा पीछे से बजाता जाता है।
ढोल -: एक ऐसा वाद्य है जिसके दो ओर चमड़ा कसा जाता है। दायीं ओर की कसी खाल ही बजाने के काम आती है। ढोल भी ताम्बे या पीतल से बनाया जाता है। नगाड़े के साथ ढोल का स्वर ताल और लय के लिये आवश्यक होता है। ढोल के बिना नगाड़े का स्वर नहीं बन पाता।
रणसिंघा -: की अपनी ही शान है। कुछ स्थानों पर इसे ‘नरशिंगा’ या ‘नरसिंघा’ भी कहते हैं। पुराने समय में रणसिंघा युद्ध क्षेत्र में अपनी रणभेरी के लिए प्रसिद्ध था।
करनाल -: भी नरसिंघे के समान पीछे से आगे की ओर क्रमश:चौड़ी होती है। इसका मुंह भोंपू का सा चौड़ा होता है। इसे बजाने की भी विशेष कला है। इसका स्वर रुक-रुककर थिरकन पैदा करता है। नरसिंघा और करनाल प्राय: दोनों ही पीतल के बनाए जाते हैं। इन पर बड़े सुरुचिपूर्ण ढंग से नक्काशी की जाती है। दोनों वाद्य जोड़े में ही बजाए जाते हैं। दो करनालों या नरसिंघों का स्वर बहुत ही आह्लादकारी होता है।
शहनाई -: का विशेष स्थान है। इस वाद्य के लिये किसी ढोल-नगाड़े की आवश्यकता भी नहीं। रात्रि के एकान्त में, दूरस्थ जंगलों और घाटियों में या पर्वतों की चोटियों पर इसका स्वर आनन्दित कर देता है। एक कुशल बंसीवादक को बांसुरी के स्वरों में भी डूबता-उतरता देखा जा सकता है। गीत और नाटियों में बांसुरी वादन का विशेष महत्व है।
हिमाचल के वाद्य यंत्र यहाँ की लोक धडकन है ! इनका स्वर ताल फूटते ही लोक मन आह्लाद से भर उठता है ! आज धीरे -२ पश्चिमी सभ्यता बेशक अपने संगीत की छाप और थाप तेजी से प्रदेश के साथ-साथ पुरे देश में व्यापक रूप से बढ़ाने में कामयाब हो रही हो लेकिन हमारे परम्परागत लोकवाद्य और लोक- गीतों की पहाड़ी जनजीवन में बहुत गहरी पैठ है। इनका महत्व किसी भी दृष्टी से कम होने की कोई सम्भावना नहीं है !
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