पर्यावरण प्रकृति का हिस्सा है ! प्रकृति व पर्यावरण एक दूसरे के पूरक हैं । प्रकृति के बिना पर्यावरण की परिकल्पना नहीं की जा सकती। प्रकृति दो शब्दों से मिलकर बनी है-प्र और कृति प्र अर्थात प्रकृष्टि/श्रेष्ठ/उत्तम) और कृति का अर्थ है रचना । ईश्वर की श्रेष्ठ रचना अर्थात सृष्टि। प्रकृति से सृष्टि का बोध होता है । प्रकृति वह मूलत्व जिसका परिणाम जगत है। कहने का तात्पर्य प्रकृति के द्वारा ही समूचे ब्रह्माण्ड की रचना की गई है । पर्यावरण प्रकृति दो प्रकार की होती है- प्राकृतिक प्रकृति और मानव प्रकृति। प्राकृतिक प्रकृति में पांच तत्व -पृथ्वी , जल अग्नि, वायु और आकाश शामिल हैं। मानव प्रकृति में मन, बुद्धि और अहंकार शामिल हैं । वेदों में वर्णित है की “मनुष्य का शरीर पंचभूतों यानी अग्नि, वायु, जल, पृथ्वी और आकाश से मिलकर बना है।”इन पंचतत्वों को विज्ञान भी मानता है। अर्थात मानव शरीर प्राकृतिक प्रकृति से बना है । पर्यावरण के बगैर मानव अस्तित्व की परिकल्पना नहीं की जा सकती है । मानव प्रकृति जैसे मन, बुद्धि और अहंकार ये तीनो पर्यावरण को संतुलित या संरक्षित करते हैं। पर्यावरण शब्द का निर्माण दो शब्दों से मिल कर हुआ है। “परि”+”आवरण” परि का तात्पर्य जो हमारे चारों ओर है” और आवरण”का तात्पर्य जो घेरा हुआ अर्थात वह “परिवेश” जिसमें जीव रहता है!

आपदाएं प्राकृतिक हों या मानव निर्मित दोनों आपदाओं में मानव जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। सभी आपदाएं मानवीय असफलता का परिणाम होती हैं। मानवीय कार्य से निर्मित आपदा-लापरवाही,भूल या व्यवस्था की असफलता,मानव निर्मित आपदा कहलाती है। एक प्राकृतिक आपदा जैसे ज्वालामुखी ,विस्फोट या भूकंप भी मनुष्य की सहभागिता के बिना भयानक रूप धारण नहीं करते। मानव निर्मित आपदा में बम विस्फोट ,रासायनिक ,जैविक रेडियोलॉजिकल ,न्यूक्लिअर,रेडिएशन आदि आपदाएं आती हैं। कोरोना महामारी जैविक आपदा का ही हिस्सा है। इस महामारी ने लाखों लोगों की जान ले ली। कोरोना वायरस का संक्रमण इतना भयावह है की इससे पीड़ित मनुष्य व उसके मृत शरीर के संपर्क में आने से संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। कोविड-19 वायरस के अधिक से अधिक देशों में फैलने से लोगों को अधिक चिकत्सीय देखभाल की जरुरत पड़ रही है जिस वजह से डिस्पोजेबल फेस मास्क और अन्य सामग्रियों का उपयोग किया जा रहा है फलस्वरूप चिकित्सा अपशिष्ट भी बढ़ गया है।






कोरोना महामारी से एक तरफ लोगों का लॉक डाउन में रहने के दौरान प्रदूषण कम हुआ ,नदियां साफ़ हुई,ओजोन लेयर की परत ठीक हुई आदि चीजे मानव के शुद्धिकरण से फलित हो पाई हैं।न की इसमें कोरोना का कोई योगदान है। कोरोना महामारी के डर से मानव शुद्ध हुआ है।मानव शुद्ध हुआ तो पर्यावरण शुद्ध हुआ ।यही चीजें महामारी के ना आने पर भी की जा सकती थी।यदि मानव पहले से ही पर्यावरण के प्रति सजग रहे तो कोई भी आपदा विकराल रूप धारण नहीं करेगी।कहने का तात्पर्य यह है कि आपदा कैसी भी हो वो मानव जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है।मानव प्रकृति ,प्राकृतिक प्रकृति पर हावी है ।मन,बुद्धि और अहंकार शुद्ध हो तो मानव,प्राकृतिक आपदाओं और मानव निर्मित आपदाओं पर नियंत्रण पा सकता है ।वर्ष 2020 में जैविक आपदा और प्राकृतिक आपदाओं का कहर ये साबित करता है की मानव ने काफी लम्बे समय से प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया है।वर्ष 2020 में पूरा विश्व प्राकृतिक और मानव निर्मित आपदाओं से सहमा हुआ है।इन आपदाओं ने पर्यावरण और मानव अस्तित्व पर गहरी चोट दी है।

आपदाओं से बचने के लिए हमे अपने चारों ओर के वातावरण को संरक्षित करना होगा तथा उसे जीवन के अनुकूल बनाए रखना होगा ।

1.प्रकृति के समीप होने का सुख समझें। अपने आसपास छोटे पौधें या बड़े वृक्ष लगाएं। धरती की हरियाली को बढ़ाने के लिए कृतसंकल्प हो ।

2.प्रत्येक त्यौहार या पर्व पर पेड़ लगाकर उन यादों को चिरस्थायी बनाएं।

3.छोटे और बड़े समारोहों में अतिथि स्वागत, पुष्प गुच्छ के स्थान पर पौधे देकर सम्मानित करें,और स्नेह संबंधों को चिरस्थायी बनाएं।

4.सड़कें या घर बनाते समय यथासंभव वृक्षों को बचाएं।

5.अपने घर-आंगन में थोड़ी सी जगह पेड़ पौधों के लिए रखें। ये हरियाली देंगे, तापमान कम करेंगे,पानी का प्रबंधन करेंगे व सुकून से जीवन में सुख व प्रसन्नता का एहसास कराएंगे।

6.पानी का संरक्षण करें, हर बूंद को बचाएं ।

7.बिजली का किफायती उपयोग करें।

8.पशु पक्षियों को जीने दें। इस पृथ्वी पर मात्र इंसानों का ही नहीं मूक पशु-पक्षियों का भी अधिकार है।

9.घर का कचरा-सब्जी, फल,अनाज को पशुओं को खिलाएं।

10.अन्न का दुरूपयोग न करें।

11.यहां वहां थूक कर अपनी सभ्यता पर प्रश्नचिन्ह न लगने दें। पर्यावरण को दूषित होने से बचाएं।

पृथ्वी हरी भरी होगी तो पर्यावरण स्वस्थ होगा,पानी की प्रचुरता से जीवन सही अर्थों में समृद्ध व सुखद होगा। पर्यावरण और प्राणी एक-दूसरे पर आश्रित हैं। यही कारण है कि भारतीय चिन्तन में पर्यावरण संरक्षण की अवधारणा उतनी ही प्राचीन है जितना यहाँ मानव जाति का ज्ञात इतिहास है। हिन्दू संस्कृति में प्रत्येक जीव के कल्याण का भाव है। हिन्दू धर्म के जितने भी त्योहार हैं,वे सब प्रकृति के अनुरूप हैं। सब पर्वों में प्रकृति संरक्षण का पुण्य स्मरण है। अतएव पर्यावरण संरक्षण से हम आपदाओं पर विजय प्राप्त कर सकते हैं ।













 


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