#खून_के_रिश्ते  

भाग-147

हमारे रक्त परिवार की कई महानताएं व पवित्रताएँ हैं जो समय समय पर हमारे ज्ञान,व्यवहार व व्यक्तित्व में बदलाव करता रहता हैं। जो हमारे ज्ञान व्यवहार व व्यक्तित्व में बदलाव करता रहता हैं उसे ही परिवार कहते हैं जिससे हमारा खून का रिश्ता होता हैं वही व्यक्ति जीवन भर परिवार का सदस्य बना रहता हैं..... परिवार के इसी महत्व को देखते हम सभी रक्तमित्रो को अपने रक्त परिवार का सदस्य व अभिन्न अंग मानते हैं । हमारे रक्त का रिश्ता ही हमे आपस मे जोड़ता है। हमारा रक्त परिवार हमारी हिम्मत हैं, हमारा हौसला हैं। रक्तदानियों के रक्त परिवार की दुनिया मे एक अलग पहचान भी हैं। हमारे रक्त परिवार का समाज के निर्माण में भी महत्वपूर्ण योगदान है। सबसे महत्वपूर्ण की रक्त परिवार का प्रत्येक सदस्य "स्नेह व एकता" का प्रतीक है।इस स्नेह और प्रेम का आभास रक्तदाता महाकुम्भ से निकलने के बाद बनारस की गलियों में जाने के बाद हुआ। सुबह  सुबह काशी विश्वनाथ के दर्शन के बाद बनारस की.. गालियों में घुमने का सोभाग्य मिला..... घूमते घूमते  हम पहुंच गए वाराणासी के ठठेरी बाजार चौक पर बनारसी साड़ियों के होलसेल व्यापारी "जीवन एंड संस कॉलोक्शन" के आफिस में ... इनकी यह पर कोई रिटेल दुकान  नही है बल्कि एक बिल्डिंग के तीसरे माले पर बहुत ही शानदार आफिस बनाया हुआ है। वही पर एक ऐसे  मित्र से मिलाकात हुई जिनका नाम  हरीश वालिया उर्फ बिटु भाई हैं। इनका बनारस में बनारसी साड़ियों का होलसेल का काम है। उनके दफ्तर में पहुंचते ही भाई सत्यप्रकाश जी ने जब उनसे मुलाकात करवाई तो मालूम पड़ा के ये एक रक्तदाता हैं अभी कुछ दिनों पहले अपने जीवन का 51वां रक्तदान कर चुके है। इनकी मधुर वाणी और बहुत ही सरल स्वभाव दिल को छू गया। इन्होंने जब अपनी आफिस में साड़ियां और कई तरह के कपड़े दिखने शुरू किये तो उसी के साथ इनकी सादगी, सरलता, ईमानदारी भी दिखती गयी ..... कपड़े की जानकारी की  जितनी बरीकियां व खूबियां बताई, उससे भी ज्यादा इनके परिवार के संस्कार व बड़े भाई प्रति प्रेंम व समर्पन की झलक इनकी बातों से साफ देखने की मिली। थोड़ी ही देर के बाद इनका बीस बाईस वर्ष का बेटा हितेश दुकान में पहुचता है सभी को प्रेम पूर्वक अभिवाद करता हैं। हरीश वालिया जी शायद अपना चश्मा घर में भूल आए थे जो इनसे मंगवाया गया था। हरीश जी ने पूछा मेरा चश्मा कहा हैं.... तो बेटा कहने लगा वो तो में घर पर ही भूल आया हूँ....वालिया जी ने कहा अब दिन भर मैं काम कैसे करूँगा ....तो बेटे के दिल को छूने वाले शब्द थे  "पाप में हूं न आप क्यों चिंता करते हो".......ये हैं बनारस के संस्कार जो यहाँ की हवा में है। वालिया जी के परिवार ने जाने अपने जीवन मे कितने ही असह्य लोगो को विकट परिस्थितियों से उभरा होगा.....इसकी तो हम कल्पना ही कर सकते हैं।...इन्होंने हमें यहां की मिट्टी की सोंधी-सोंधी खुशबू वाले कुल्हड़ में  कुल्हड़ वाली चाय और बनारस का प्रसिद्ध व्यंजन पेश किया गया। जिसकी मिठास जीभ से समय के चक्र के साथ मिट सकती हैं पर इनकी मदुर वाणी और व्यक्तिव जीवन की आखरी सांस तक आनंद देता रहेगा.. यूं तो कई बड़े मंच पर कई बार कई तरह के सम्मान मिले हैं लेकिन आपके द्वारा किया गया सम्मान दुनिया के सभी सम्मान से बड़ा है....


इस पोस्ट में

1 पहले साथ पर हमारी जीवनरक्षक बहन (रेड क्रोस सोसाइटी) गुजरात के अहमदाबाद से श्री मति वैशाली पांड्या जी जो अपने जीवन मे 48 बार से ज्यादा रक्तदान कर चुकी हैं!

3 श्री सत्यप्रकाश आर्या जी वाराणसी-उत्तर प्रदेश से है 112 से ज्यादा बार रक्तदान कर चुके है।

4 श्री संजीव जी मेहता हरियाणा से 98 बार रक्तदान कर चुके हैं।

5 श्री हरीश वालिया जी वाराणसी से हैं जो 53 बार रक्तदान कर चुके है।

6 प्रेरक जीवनरक्षक व बड़े भाई श्री महेंद्र जोशी जी गुजरात से 129 बार रक्तदान कर चुके हैं।



जय रक्तदाता !! जय जीवनरक्षक !!💐🇮🇳


✍️Rgds.. blooddonor nk Sml🙏🏻