श्री कृष्ण कहते हैं - देखो पार्थ! धर्म का जो विधान किसी दूसरे ने बनाया हो वो तुम्हारा धर्म नहीं हो सकता। तुम्हारा धर्म वही है जिसे तुमने स्वयं बनाया हो। जिसे तुम्हारी आत्मा ने स्वीकार किया हो। 


वैसे भी मिट्टी के दीपक सा 
है ये जीवन
तेल खत्म 
खेल खत्म ....
इससे पहले के जीवन का खेल ख़त्म हो किसी कमजोर व निर्बल का सहारा बनो। अन्याय का प्रतिकार करो। स्वार्थी नहीं, सारथी बनों।